सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

...जननी गयी हैं मुझसे रूठ .

माँ तुझे सलाम


वो चेहरा जो
        शक्ति था मेरी ,
वो आवाज़ जो
      थी भरती ऊर्जा मुझमें ,
वो ऊँगली जो
     बढ़ी थी थाम आगे मैं ,

वो कदम जो
    साथ रहते थे हरदम,
वो आँखें जो
   दिखाती रोशनी मुझको ,

वो चेहरा
   ख़ुशी में मेरी हँसता था ,
वो चेहरा
   दुखों में मेरे रोता था ,
वो आवाज़
   सही बातें  ही बतलाती ,
वो आवाज़
   गलत करने पर धमकाती ,

वो ऊँगली
   बढाती कर्तव्य-पथ पर ,
वो ऊँगली
  भटकने से थी बचाती ,
वो कदम
   निष्कंटक राह बनाते ,
वो कदम
   साथ मेरे बढ़ते जाते ,
वो आँखें
   सदा थी नेह बरसाती ,
वो आँखें
   सदा हित ही मेरा चाहती ,
मेरे जीवन के हर पहलू
   संवारें जिसने बढ़ चढ़कर ,
चुनौती झेलने का गुर
     सिखाया उससे खुद लड़कर ,
संभलना जीवन में हरदम
     उन्होंने मुझको सिखलाया ,
सभी के काम तुम आना
    मदद कर खुद था दिखलाया ,

वो मेरे सुख थे जो सारे
   सभी से नाता गया है छूट ,
वो मेरी बगिया की माली
   जननी गयी हैं मुझसे रूठ ,
गुणों की खान माँ को मैं
    भला कैसे दूं श्रद्धांजली ,
ह्रदय की वेदना में बंध
    कलम आगे न अब चली .
           शालिनी कौशिक
                [कौशल ]

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

गौतम से पहले मुनेश को सलाम

''दरों दीवार पे हसरत से नज़र रखते हैं ,
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं .''
    कह एलम का नौजवान गौतम पंवार भी अपने  देश पर शहीद हो गया और नाम रोशन कर गया न केवल अपने छोटे से कसबे एलम का बल्कि पूरे प्रदेश का जहाँ से कोई भी अब ये नहीं कह सकता कि यहाँ की मिटटी में केवल नेता ही जन्म लेते हैं .गौतम की निपुणता के मुरीद थे अफसर .एक युवा ,बहादुर नौजवान का इस तरह चले जाना बहुत दुखद है और सबसे ज्यादा उस माँ के लिए जो अपना जीवन अपने बच्चों के लिए ही कुर्बान कर देती है .
      जानती हूँ मेरी पोस्ट का  शीर्षक सबको अजीब लगेगा और कुछ को तो गुस्सा भी आ जायेगा किन्तु मैं यहाँ गौतम से भी ज्यादा बड़ी शहादत देख रही हूँ मुनेश की जो सौभाग्य से गौतम के ही कहूँगी ,माँ है ,समाचारपत्र से ही पता लगा कि मुनेश देवी के पति तो नौकरी के कारण घर से बाहर ही रहते थे और मुनेश देवी ने ही अपने तीनों बच्चों में वो प्रेरणा उत्पन्न की कि वे देश सेवा के योग्य बन सके .
      माँ का रिश्ता होता ही ऐसा है जो अपने बारे में कुछ नहीं सोचता ,उसके मन में चौबीस घंटे अपने बच्चे की चिंताएं हावी रहती हैं ,ऐसे में अपने लाल के यूँ बिछड़ जाना कि अब कभी नहीं मिलेगा ,सोचना भी ह्रदय विदारक है फिर यहाँ तो ये हो गया .
      पर हम जानते हैं जो माँ अपने एक बेटे के गम में डूबी हुई भी हो वह अपने और बच्चों की बेहतरी के लिए अपने ह्रदय पर पत्थर रख ही लेती है और यही अब मुनेश को भी करना है ,अर्जुन और वैशाली भले ही सेना में हों ,पुलिस में हों लेकिन मुनेश के बच्चे हैं और इनके लिए माँ अपने फ़र्ज़ को निभाएगी ,हमेशा से निभाती आयी है ,क्योंकि हम तो सिवाय सांत्वना के उन्हें कुछ नहीं दे सकते केवल इतना कह सकते हैं कि भगवान गौतम की आत्मा को शांति दे [ जिसे कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि वह देश पर कुर्बान हुआ है और देश पर कुर्बान होने वालों को तो स्वयं भगवान भी सलाम करते हैं ]और उसके परिजनों को यह दुःख सहन करने की शक्ति दे .
         गौतम पंवार को सलाम और उनसे भी पहले मुनेश को मेरा बार बार सलाम क्योंकि आपने माँ का पद एक बार फिर नमन योग्य बना दिया है .बस अब केवल यही -
ए मेरे वतन के लोगों,
ज़रा आँख में भर लो पानी ,
जो शहीद हुए हैं उनकी 
ज़रा याद करो क़ुरबानी .''
जय हिन्द -जय गौतम -जय मुनेश 

शालिनी कौशिक 
      [कौशल ]

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

इज़्ज़तघर मतलब नया बलात्कार घर

Image result for izzatghar with modi image

PM मोदी ने रखी शौचालय की नींव, बोले-शौचालय महिलाओं के लिए इज्जतघर

वाराणसी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी दौरे पर शहंशाहपुर में शौचालय की नींव रख स्वच्छता अभियान की शुरुआत की पीएम ने यहां एक जमसभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम में से कोई गंदगी में नहीं रहना चाहता लेकिन फिर भी स्वच्छता हमारी जिम्मेदारी है यह स्वभाव हमारे देश में पनपा नहीं है उन्होंने कहा कि गंदगी हम करते हैं और स्वच्छता कोई औतारीफ र करेगा यह प्रवृत्ति हमारे समाज से गई नहीं है .
     प्रधानमंत्री  मोदी जी की जितनी की जाये कम है क्योंकि उन्होंने जिस काम का बीड़ा उठाया है वह हमारे देश का एक बहुत बड़ा कलंक है और आश्चर्य है कि आज से पहले इस ओर किसी का ध्यान गया ही नहीं .बस में होते थे या ट्रेन में खेतों में शौच के लिए जाते लोग दिख जाते थे और महिलाओं की स्थिति तो इतनी ख़राब थी या कहूं कि अब भी है क्योंकि अभी भी इसका समूल निपटारा थोड़े ही हुआ है ,यही कि महिलाओं के साथ कितने ही बलात्कार उनके शौच जाने के समय ही होते थे और होते हैं भी ,किन्तु शौचालय को इज़्ज़तघर नाम देना गले से नीचे नहीं उतर रहा .
            हमारे समाज में शायद सर्वाधिक अपराध महिलाओं के साथ ही होते हैं-दहेज़ प्रथा ,कन्या भ्रूण हत्या ,छेड़छाड़ ,तेजाब डालना और सबसे निकृष्ट बलात्कार जिसके बारे में मैं बेखटके कह सकती हूँ कि इसका एक मुख्य कारण इसे नारी की व् उसके परिवार की इज़्ज़त से जोड़ दिया जाता है और इसके बाद नारी की व् उसके परिवार की ज़िंदगी लगभग खत्म ही हो जाती है और अब प्रधानमंत्री  जी ने  भी इसे इज़्ज़तघर नाम दे दिया इसका साफ़ साफ इशारा ऐसे वहशियों को मिला है जिनका कार्य केवल औरतों से बलात्कार करना है और अब निश्चित ये आक्रमण वहीँ होने हैं ,गुड़गांव का प्रद्युम्न हत्याकांड भी शौचालय में ही हुआ है ,और अगर हम थोड़ा सा विचार करें तो हम पाएंगे कि गाँधी जी ने हरिजन नाम दिया इस जाति के लोगों को नीचे दिखाने के लिए नहीं अपितु भगवान का इनके प्रति अटूट स्नेह दिखाने के लिए और आज यही नाम इनके लिए नफरत की श्रेणी में है .
       ऐसे में मेरा कहना है कि इसे इज़्ज़त से न जोड़कर सुविधा सुरक्षा से जोड़ा जाये तो ज्यादा उपयुक्त रहेगा क्योंकि ये एक मानने लायक बात है कि यदि बलात्कार से नारी व् उसके परिवार की इज़्ज़त के लूटने से जोड़ना बंद हो जाये ,इसे मात्र एक अपराध की श्रेणी मिल जाये तो ये अपराध नगण्य होते देर नहीं लगेगी .
शालिनी कौशिक 
[कौशल]

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

संस्कृति रक्षक केवल नारी

यूनान ,मिस्र ,रोमां सब मिट गए जहाँ से ,
बाकी अभी है लेकिन ,नामों निशां हमारा .
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ,
सदियों रहा है दुश्मन ,दौरे ज़मां हमारा .
भारतीय संस्कृति की अक्षुणता को लक्ष्य कर कवि इक़बाल ने ये ऐसी अभिव्यक्ति दी जो हमारे जागृत व् अवचेतन मन में चाहे -अनचाहे विद्यमान  रहती है  और साथ ही इसके अस्तित्व में रहता है वह गौरवशाली व्यक्तित्व जिसे प्रभु ने गढ़ा ही इसके रक्षण के लिए है और वह व्यक्तित्व विद्यमान है हम सभी के सामने नारी रूप में .दया, करूणा, ममता ,प्रेम की पवित्र मूर्ति ,समय पड़ने पर प्रचंड चंडी ,मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री ,माता के समान हमारी रक्षा करने वाली ,मित्र और गुरु के समान हमें शुभ कार्यों  के लिए प्रेरित करने वाली ,भारतीय संस्कृति की विद्यमान मूर्ति श्रद्धामयी  नारी के विषय में ''प्रसाद''जी लिखते हैं -
''नारी तुम केवल श्रद्धा हो ,विश्वास रजत नग-पग तल में ,
पियूष स्रोत सी बहा करो ,जीवन के सुन्दर समतल में .''
संस्कृति और नारी एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं .नारी के गुण ही हमें संस्कृति के लक्षणों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं .जैसे भारतीय नारी में ये गुण है  कि वह सभी को अपनाते हुए गैरों को भी अपना बना लेती है वैसे ही भारतीय संस्कृति में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से आई संस्कृतियाँ समाहित होती गयी और वह तब भी आज अपना अस्तित्व कायम रखे हुए है और यह गुण उसने नारी से ही ग्रहण किया है .
   संस्कृति मनुष्य की विभिन्न साधनाओं की अंतिम परिणति है .संस्कृति उस अवधारणा को कहते हैं जिसके आधार पर कोई समुदाय जीवन की समस्याओं पर दृष्टि निक्षेप करता है .''आचार्य हजारी प्रसाद द्वैदी  ''के शब्दों में ,-
''नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं कलात्मक प्रयत्नों और भक्ति तथा योगमूलक अनुभूतियों के भीतर मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को क्रमशः  प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम ''संस्कृति''शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं .''
    इस प्रकार किसी समुदाय की अनुभूतियों के संस्कारों के अनुरूप ही सांस्कृतिक अवधारणा का स्वरुप निर्धारित होता है .संस्कृति किसी समुदाय,जाति अथवा देश का प्राण या आत्मा होती है ,संस्कृति द्वारा उस जाति ,राष्ट्र अथवा समुदाय के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है जिनके सहारे वह अपने आदर्शों ,जीवन मूल्यों आदि का निर्धारण करता है और ये समस्त संस्कार जीवन के समस्त क्षेत्रों में नारी अपने हाथों  से प्रवाहित  करती  है .जीवन के आरम्भ  से लेकर अंत तक नारी की भूमिका संस्कृति के रक्षण में अमूल्य है .
    भारतीय संस्कृति का मूल तत्व ''वसुधैव कुटुम्बकम ''है .सारी वसुधा को अपना घर मानने वाली संस्कृति का ये गुण नारी के व्यव्हार में स्पष्ट दृष्टि गोचर होता है .पूरे परिवार को साथ लेकर चलने वाली नारी होती है .बाप से बेटे में पीढ़ी  दर पीढ़ी संस्कार भले ही न दिखाई दें किन्तु सास से बहू तक किसी भी खानदान के रीति-रिवाज़ व् परम्पराएँ हस्तांतरित होते सभी देखते हैं .
    ''जियो और जीने दो''की परंपरा को मुख्य सूत्र के रूप में अपनाने वाली हमारी संस्कृति अपना ये गुण भी नारी के माध्यम  से जीवित रखते दिखाई देती है .हमारे नाखून जो हमारे शरीर पर मृत कोशिकाओं के रूप में होते हैं किन्तु नित्य प्रति उनका बढ़ना जारी रहता है ..हमारी मम्मी ने ही हमें बताया था कि उनकी दादी ने ही उनको बताया था -''कि नाखून काटने के बाद इधर-उधर नहीं फेंकने चाहियें बल्कि नाली में बहा देना चाहिए .''हमारे द्वारा ऐसा करने का कारण पूछने पर मम्मी ने बताया -''कि यदि ये नाखून कोई चिड़िया खाले तो वह बाँझ हो सकती है और इस प्रकार हम अनजाने में चिड़ियों की प्रजाति के खात्मे के उत्तरदायी हो सकते हैं .''
         इन्सान जितना पैसे बचाने के लिए प्रयत्नशील रहता है शायद किसी अन्य कार्य के लिए रहता हो .हमारी मम्मी ने ही हमें बताया -''कि जब पानी भर जाये तो टंकी बंद कर देनी चाहिए क्योंकि पानी यदि व्यर्थ में बहता है तो पैसा भी व्यर्थ में बहता है अर्थात खर्च होता है व्यर्थ में .
     घरों में आम तौर पर सफाई के लिए प्रयोग होने वाली झाड़ू के सम्बन्ध में दादी ,नानी ,मम्मी सभी से ये धारणा हम तक आई है कि झाड़ू लक्ष्मी स्वरुप होती है इसे पैर नहीं लगाना चाहिए और यदि गलती से लग भी जाये तो इससे क्षमा मांग लेनी चाहिए . और ये भावना नारी की ही हो सकती है कि एक छोटी सी वस्तु का भी तिरस्कार न हो . हमारी संस्कृति कहती है कि ''जैसा व्यवहार आप दूसरों से स्वयं के लिए चाहते हो वही दूसरों के साथ करो .''अब चूंकि सभी अपने लिए सम्मान चाहते हैं ऐसे में नारी द्वारा झाड़ू जैसी छोटी वस्तु को भी लक्ष्मी का दर्जा दिया जाना संस्कृति की इसी भावना का पोषण है वैसे भी ये मर्म एक नारी ही समझ सकती है कि यदि झाड़ू न हो तो घर की सफाई कितनी मुश्किल है और गंदे घर से लक्ष्मी वैसे भी दूर ही रहती हैं .
    हमारी संस्कृति कहती है -
   ''यही पशु प्रवर्ति है कि आप आप ही चरे ,
    मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे .''
भूखे को भोजन खिला उसकी भूख शांत करना हमारी संस्कृति में मुख्य कार्य के रूप में सिखाया गया है और इसका अनुसरण करते हुए ही हमारी मम्मी ने हमें सिखाया -''कि तुम दूसरे को खिलाओ ,वह तुम्हे मुहं से दुआएँ दे या न दे आत्मा से ज़रूर देगा .''
      भारतीय संस्कृति की दूसरों की सेवा सहायता की भावना ने विदेशी महिलाओं को भी प्रेरित किया .मदर टेरेसा ने यहाँ आकर इसी भावना से प्रेरित होकर अपना सम्पूर्ण जीवन इसी संस्कृति के रक्षण में अर्पित कर दिया .आरम्भ से लेकर आज तक नर्स की भूमिका नारी ही निभाती आ रही है क्योंकि स्नेह व् प्रेम का जो स्पर्श मनुष्य को जीवन देने के काम आता है वह प्रकृति ने नारी के ही हाथों में दिया है .
    हमारी ये महान संस्कृति परोपकार के लिए ही बनी है और इसके कण कण में ये भावना व्याप्त है .संस्कृत का एक श्लोक कहता  है -
  ''पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः ,
  स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः.
  नादन्ति शस्याम खलु वारिवाहा ,
  परोपकाराय  सताम विभूतयः ."    
    और नारी अपने फ़र्ज़ के लिए अपना सारा जीवन कुर्बान कर देती है .अपना या अपने प्रिय से प्रिय का भी बलिदान देने से वह नहीं हिचकती है .जैसे इस संस्कृति में पेड़ छाया दे शीतलता पहुंचाते हैं नदियाँ प्यास बुझाने के लिए जल धारण करती हैं .माँ ''गंगा ''का अवतरण भी इस धरती पर जन जन की प्यास बुझाने व् मृत आत्माओं की शांति व् मुक्ति के लिए हुआ वैसे ही नारी जीवन भी त्याग बलिदान की अपूर्व गाथाओं से भरा है इसी भावना से भर पन्ना धाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे कुंवर उदय सिंह की रक्षा की .महारानी सुमित्रा ने इसी संस्कृति का अनुसरण करते हुए बड़े भाइयों की सेवा में अपने दोनों पुत्र लगा दिए .देवी सीता ने इस संस्कृति के अनुरूप ही अपने पति चरणों की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया .उर्मिला ने लक्ष्मण की आज्ञा पालन के कारण अपने नयनों से अश्रुओं को बहुत दूर कर दिया ..
      नारी का संस्कृति रक्षण में सहभाग ऐसी अनेकों कहानियों को अपने में संजोये है इससे हमारा इतिहास भरा है वर्तमान जगमगा रहा है और भविष्य भी निश्चित रूप में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा .

                              शालिनी कौशिक 
                        [   कौशल ]


                             

रविवार, 24 सितंबर 2017

बेशर्म हैं वो लाठियां



डूब कर मरने की भी
बददुआ है बेअसर,
आंख का पानी भी जिनका
सूख गया इस कदर,
न्याय के लिए बढ़ी
बेटियों को क्या मिला?
ज्यादती की इंतिहां
हैं पुलिस की लाठियां!!!

हक नहीं गर बेटियों को
बोलने का देश में,
तानाशाही चल रही
जनतंत्र तेरे भेष में,
न रूकेगा बेटियों
जान लो ये सिलसिला,
ज्यादती की इंतिहां
है पुलिस की लाठियां!

बेशर्म है वो लाठियां
बेटियों पर जो पड़ी,
बेशर्म हैं वो हाथ जिनमें
लाठियां थी वे थमी,
अब ढ़हाना है हमें
बेशर्म ताकत का किला,
ज्यादती की इंतिहां
हैं पुलिस की लाठियां!!

शिखा कौशिक नूतन 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ब्रह्मरूप-पुरुष –उठो जागो बोध प्राप्त करो--डा श्याम गुप्त

----ब्रह्मरूप-पुरुष –उठो जागो बोध प्राप्त करो ---
------माँ शक्ति रूपा के आगमन के प्रथम दिवस पर----
-----आदिशक्ति...नारी सृष्टि का आधार है, परन्तु ‘एकोहं बहुस्यामि’ के सृष्टि-विचार का आधार तो ब्रह्म...पुरुष ही है |
                         मनुस्मृति---पुरुष ही लिखता है, किसी भी नारी ने कोई महान कालजयी ग्रन्थ की रचना की है?..नहीं| इसमें पुरुष-प्रधान समाज का घिसा-पिटा गाना गाया जासकता है परन्तु उस समाज में तो नारी-पुरुष का समान अधिकार था | तभी तो लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, यमी, भारती आदि ऋषिकाओं की उपस्थिति है |
                         जब जब भी पुरुष निर्बल, असहाय होजाता है तब-तब नारी दुर्गा रूप लेकर युद्धरत होती है ..यह अवधारणा केवल भारत में ही है, अन्य कहीं है भी तो यहीं से गयी हुईं, फ़ैली हुई संस्कृतियों में व उनकी स्मृतियों/ कथाओं में हैं|
                    परन्तु दुर्गा को बल ब्रह्मा, विष्णु, शिव व अन्य देवता, अर्थात पुरुष ही, अपनी शक्तियों के रूप में देते हैं तब दुर्गा में शक्ति का अवतरण होता है | उस प्रचंड शक्ति के काली रूपमें उद्दाम, असंयमित वेग को पुरुष (महादेव) ही रोकता है, नियमित करता है |
                        पुरुष-श्री कृष्ण के गुणों पर नारियां रीझती हैं, विष्णु को पति रूप में पाने हेतु, शिव के लिए भी तप करती हैं ..परन्तु कोइ एसा केंद्रीय नारी चरित्र नहीं है जिसके गुणों पर संसार भर के पुरुष रीझ जाएँ | हाँ शारीरिक रूप सौन्दर्य के दीवानों की गाथाएँ मिलतीं हैं अथवा महामाया माँ दुर्गा पर सौंदर्य लोलुप दुष्ट दानवों, असुरों द्वारा अनुचित प्रस्ताव रखने पर मृत्यु को वरण करने की गाथाएँ |
                    अतः निश्चय ही सृष्टि की जनक नारी है परन्तु पुरुष की नियमन व्यवस्था के अनुसार | अतः आज के परिप्रेक्ष्य में ---
-----वे पुरुष के आचरण सुधार की बातें करती रहेंगी एवं स्वयं सलमान खान व शाहरुख के पीछे भागती रहेंगीं|
-----वे हीरोइनों के वस्त्राभूषणों की नक़ल करेंगीं, स्वतंत्र रूप से रात-विरात अकेली स्वच्छंदता का भी अनुसरण करेंगीं ( जबकि हीरोइनें तो बोडीगार्ड के साथ रहती हैं)| हीरोइनों के पीछे भागने की वजाय सलमान, शाहरुख के पीछे भागेंगी | ( कुछ विद्वान नारियां हर काल की तरह अपवाद भी होती हैं ) |
------वे कहेंगीं कि समाज अपनी सोच बदले | समाज में तो स्त्री-पुरुष दोनों ही होते हैं अकेले पुरुष से कब समाज बनता है अतः दोनों को ही सोच बदलनी चाहिए |
-----वे पुरुष को साधू-संत बनने को कहेंगीं परन्तु स्वयं डायरेक्टर की इच्छा/आज्ञा पर /पैसे के लिए वस्त्र उतारती रहेंगीं |
------ वे देह –दर्शना वस्त्र पहनती रहेंगीं, उनका तर्क है की छोटी-छोटी बालिकाओं से, गाँव में पूरे वस्त्र पहने महिलाओं से भी वलात्कार होता है अतः वस्त्र कम पहनने से कुछ नहीं होता अपितु पुरुष व समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी|
                    वे भूल जाती हैं कि- कम वस्त्रों, अश्लील चित्रों, सिनेमा, विज्ञापन आदि से जाग्रत उद्दाम वासना से जो भी व्यक्ति की पहुँच में होगा वही प्रभावित होगा | आप तो बाडीगार्ड, परिवार आदि की सुरक्षा में हैं, कौन हाथ डालने की हिंम्मत करेगा| चोर किसी प्रधानमन्त्री या पुलिस वाले के घर चोरी करने थोड़े ही जायेगा, जहां सुरक्षा कम है वहीं दांव लगाएगा |
------- इनसे कुछ नहीं होगा ----
                          अतः हे पुरुषो ! ब्रह्म रूप बनो, अपनी ज्ञान, विवेक व सदाचरण रूपी दैविक शक्तियां जाग्रत करो...उदाहरण बनो और अपनी जाग्रत शक्तियों को प्रदान करो नारी को ताकि वह पुनः दुर्गा का दुष्ट दलन रूप बनकर समाज में पूज्य बने |
                    और आप सच में ही---“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” के महामंत्र के गान के योग्य बनें |


चित्र--सिंह वाहिनी माँ की वन्दना रत त्रिदेव व ऋषि-मुनि----
------महाभारत -गूगल साभार
 

शनिवार, 16 सितंबर 2017

ये है नारी शक्ति

 

नारी की सशक्तता यहाँ देखो /इनमे देखो .


मैंने बहुत पहले एक आलेख लिखा था-

Maa DurgaMaa DurgaMaa Durga

ये सर्वमान्य तथ्य है कि महिला शक्ति का स्वरुप है और वह अपनों के लिए जान की बाज़ी  लगा भी देती है और दुश्मन की जान ले भी लेती है.नारी को अबला कहा जाता है .कोई कोई तो इसे बला भी कहता है  किन्तु यदि सकारात्मक रूप से विचार करें तो नारी इस स्रष्टि की वह रचना है जो शक्ति का साक्षात् अवतार है.धेर्य ,सहनशीलता की प्रतिमा है.जिसने माँ दुर्गा के रूप में अवतार ले देवताओं को त्रास देने वाले राक्षसों का संहार किया तो माता सीता के रूप में अवतार ले भगवान राम के इस लोक में आगमन के उद्देश्य को  साकार किया और पग-पग पर बाधाओं से निबटने में छाया रूप  उनकी सहायता की.भगवान विष्णु को अमृत देवताओं को ही देने के लिए और भगवान् भोलेनाथ  को भस्मासुर से बचाने के लिए नारी के ही रूप में आना पड़ा और मोहिनी स्वरुप धारण कर उन्हें विपदा से छुड़ाना पड़ा.
हमारे संस्कृत ग्रंथों में कहा गया है -
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता."
प्राचीन काल  का इतिहास नारी की गौरवमयी  कीर्ति से भरा पड़ा है.महिलाओं ने समय समय पर अपने साहस पूर्ण कार्यों से दुश्मनों के दांत खट्टे किये हैं.प्राचीन काल में स्त्रियों का पद परिवार में अत्यंत महत्वपूर्ण था.गृहस्थी का कोई भी कार्य उनकी सम्मति के बिना नहीं किया जा सकता था.न केवल धर्म व् समाज बल्कि रण क्षेत्र में भी नारी अपने पति का सहयोग करती थी.देवासुर संग्राम  में कैकयी ने अपने अद्वित्य रण कौशल से महाराज दशरथ को चकित किया था.
गंधार के राजा रवेल की पुत्री विश्पला ने सेनापति का दायित्व स्वयं पर लेकर युद्ध किया .वह वीरता से लड़ी पर तंग कट गयी ,जब ऐसे अवस्था में घर पहुंची तो पिता को दुखी देख बोली -"यह रोने का समय नहीं,आप मेरा इलाज कराइये मेरा पैर ठीक कराइये जिससे मैं फिर से ठीक कड़ी हो सकूं तो फिर मैं वापस शत्रुओसे  सामना करूंगी ."अश्विनी कुमारों ने उसका पैर ठीक किया और लोहे का पैर जोड़ कर उसको वापस खड़ा किया -

" आयसी जंघा विश्पलाये अदध्यनतम  ".[रिग्वेद्य  १/ ११६]
इसके बाद विश्पला ने पुनः     युद्ध किया और शत्रु को पराजित किया.
महाराजा  रितध्वज    की पत्नी      मदालसा ने अपने पुत्रों को समाज में जागरण के लिए सन्यासी बनाने का निश्चय किया .महाराजा   रितध्वज के आग्रह पर अपने आठवे पुत्र अलर्क को योग्य शासक बनाया.व् उचित समय पर पति सहित वन को प्रस्थान कर गयी.जाते समय एक यंत्र अलर्क को दिया व् संकट के समय खोलने का निर्देश दिया.कुछ दिनों बाद जब अलर्क के बड़े भाई ने उसे राजपाट सौंपने का निर्देश दिया तब अलर्क ने वह यंत्र खोला जिसमे सन्देश लिखा था-"संसार के सभी ईश्वर अस्थिर हैं तू शरीर मात्र नहीं है ,इससे ऊपर उठ."और उसने बड़े भाई को राज्य सौंप देने का निश्चय किया.सुबाहु इससे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें ही राज्य करते रहने का आदेश दिया.राजा  अलर्क को राज ऋषि की पदवी मिली .यह मदालसा की ही तेजस्विता थी जिसने ८ ऋषि तुल्य पुत्र समाज को दिए.
तमलुक [बंगाल] की रहने वाली मातंगिनी हाजरा ने ९ अगस्त १९४२ इसवी में भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया और आन्दोलन में प्रदर्शन के दौरान वे ७३ वर्ष की उम्र में अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हुई और मौत के मुह में समाई .
असम के दारांग जिले में गौह्पुर   गाँव की १४ वर्षीया बालिका कनक लता बरुआ ने १९४२ इसवी के भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया .अपने गाँव में निकले जुलूस का नेतृत्व इस बालिका ने किया तथा थाने पर तिरंगा झंडा फहराने के लिए आगे बढ़ी पर वहां के गद्दार थानेदार ने उस पर गोली चला दी जिससे वहीँ उसका प्राणांत हो गया.
इस तरह की नारी वीरता भरी कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है.और किसी भी वीरता,धैर्य        ज्ञान      की तुलना नहीं की जा सकती.किन्तु इस सबके बावजूद नारी को अबला  बेचारी  कहा जाता है.अब यदि हम कुछ और उदाहरण  देखें तो हम यही पाएंगे कि नारी यदि कहीं झुकी है तो अपनों के लिए झुकी है न कि अपने लिए .उसने यदि दुःख सहकर भी अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी है तो वह अपने प्रियजन    के दुःख दूर करने के लिए.
कस्तूरबा गाँधी,जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में घूमकर महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .चंपारण ,भारत छोडो आन्दोलन में जिनका योगदान अविस्मर्णीय रहा ,ने भी पतिव्रत धर्म के पालन के लिए कपडे धोये,बर्तन मांजे और   ऐसे ऐसे कार्य किये जिन्हें कोई सामान्य भारतीय नारी सोचना भी पसंद नहीं करेगी.
महाराजा जनक की पुत्री ,रघुवंश की कुलवधू,राम प्रिय जानकी सीता ने पतिव्रत धर्म के पालन के लिए वनवास में रहना स्वीकार किया.
हमारे अपने ही क्षेत्र की  एक कन्या मात्र इस कारण से जैन साध्वी के रूप में दीक्षित हो गयी कि उसकी बड़ी बहन के साथ उसके ससुराल वालों ने अच्छा व्यव्हार नहीं किया और एक कन्या इसलिए जैन साध्वी बन गयी कि उसकी प्रिय सहेली साध्वी बन गयी थी.
स्त्रियों का प्रेम, बलिदान ,सर्वस्व समर्पण ही उनके लिए विष बना है.गोस्वामी तुलसीदास जी नारी को कहते हैं-
"ढोल गंवार शुद्रपशु नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी. "
वे एक समय पत्नी  प्रेम में इतने पागल थे कि सांप को रस्सी समझ उस पर चढ़कर पत्नी  के मायके के कमरे में पहुँच गए थे.ऐसे में उनको उनकी पत्नी  का ही उपदेश था जिसने उन्हें विश्व वन्दनीय बना दिया था-
"अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीती,
ऐसी जो श्रीराम में होत न तो भाव भीती."
इस तरह नारी को अपशब्दों के प्रयोग द्वारा    जो उसकी महिमा को नकारना चाहते हैं वे झूठे गुरुर में जी रहे हैं और अपनी आँखों के समक्ष उपस्थित सच को झुठलाना चाहते हैं .आज नारी निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही है .भावुकता सहनशीलता जैसे गुणों को स्वयं से अलग न करते हुए वह पुरुषों के झूठे दर्प के आईने को चकनाचूर कर रही है .अंत में नईम अख्तर के शब्दों में आज की नारी पुरुषों से यही कहेगी-
"तू किसी और से न हारेगा,
तुझको तेरा गुरुर मारेगा .
तुझको    दस्तार जिसने बख्शी है,
तेरा सर भी वही उतारेगा ."

आज मैं उसी कड़ी में अपने विचारों को आगे रख रही हूँ और बता रही हूँ नारी के ऐसे वर्ग के बारे में जो सशक्त है सबल है और केवल इसलिए क्योंकि वह भावुकता जैसी कमजोरी से कोसों दूर है .बहुत दिन पहले मेरे पापा ने मुझे बताया कि वे एक कमीशन में गए थे वहां पर जाट समुदाय की एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें बताया कि -''बाबूजी !हम जाट औरतें अपना कार्य स्वयं देखती हैं और अपने पुरुषों पर आश्रित नहीं हैं .अन्य समुदायों में जैसे  औरतें आदमियों का हर काम में मुंह देखती हैं और उनके लिए ही भगवान के आगे झुकी रहती हैं हम्मे ऐसा नहीं है और इसलिए हममे न करवा चौथ होती है और न ही रक्षा बंधन .हम खुद पर ही ज्यादा विश्वास करती हैं और अपने आदमियों को अपने मालिक का दर्जा नहीं देती ''और ये हम सभी देखते भी हैं जाट औरतें जाट आदमियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलती हैं और खेती हो या नौकरी हर काम में अपना दबदबा रखती हैं .
ऐसे ही जैन समुदाय है जिसमे हमारे क्षेत्र में अधिकांश सर्राफ हैं और इनकी औरतें इनमे आदमियों से पूरी बराबरी करती हैं और अतिश्योक्ति न होगी अगर यह कहा जाये कि आदमियों को अपनी मुट्ठी में रखती हैं .ये धन का ,जेवर का लेनदेन आदि सभी कार्यों में बराबर का सहयोग व् हिस्सा रखती हैं और इनके परिवार में कोई भी फैसला हो इनकी जानकारी व् साझेदारी के बगैर नहीं लिया जा सकता .
बहुत अभिमान करते हैं हम अपने उच्च वर्ग या माध्यम वर्ग से सम्बंधित होने पर किन्तु यदि सच्चाई से बात की जाये तो सबसे अधिक सबल नारी निम्न वर्ग की ही कही जाएगी और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आप सभी स्वयं देख सकते हैं .सुबह सवेरे हम जैसे ही अपने घर के बाहर देखते हैं तो पाते हैं कि बहुत सी नारियों का झुण्ड चला जा रहा है जो कमीज-पेटीकोट पहने होती हैं और उनके हाथों में हंसिया -खुरपी आदि औजार होते हैं दिन भर वे इन औजारों से खेतों में मेहनत करती हैं और शाम को फिर ऐसे ही बतियाते हुए लौटती हैं जैसे सुबह काम पर जाते हुए बतिया रही थी .यही नहीं कहने को अनपढ़ कही जाने वाले ये महिलाएं किसी से सशक्ति करण की मांग नहीं करती और देश के लिए अपने घर परिवार के लिए एक मुखिया की हैसियत में ही काम करती हैं और अपना दबदबा सभी के दिमाग पर बनाये रखती हैं ये वे हैं जो भरे पूरे आदमियों के परिवारों में होते हुए भी अपने जानवरों को स्वयं हांककर घर कुशलता से ले आती हैं और इस तरह पुरुष की ताकत को दरकिनारकर एक तरफ रख देती हैं 

.
 

.कारण केवल एक है ये अपने वर्चस्व की राह में और कार्य के बीच में भावुकता को आड़े नहीं आने देती और पूर्ण व्यावसायिक होकर अपने कर्मक्षेत्र पर आगे बढती हैं और ये कभी किसी के आगे नारी की कमजोरी का रोना नहीं रोती क्योंकि ये वे हैं जो भारतीय नारी को इस विश्व में कर्मशील प्राणी का सम्मान दिलाती हैं .ये केवल यही कहती हैं -
''कोमल है कमजोर नहीं तू ,
शक्ति का नाम ही नारी है .''


शालिनी कौशिक
[कौशल ]